Maharashtra: बच्चों के संबंधित अधिकारों से आयोग ने 2020 में नहीं सुना एक भी केस

Maharashtra: बच्चों के संबंधित अधिकारों से आयोग ने 2020 में नहीं सुना एक भी केस

9 जनवरी 2021 को भंडारा में जिला सामान्य अस्पताल की नवजात केयर सेंटर में 10 प्रीमेच्योर बच्चों की आग लगने से मौत हो गई थी। 18 जनवरी, 2021 को महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के नांदेड़ जिले में एक नाबालिग छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार करने के लिए दो शिक्षकों सहित पांच लोगों पर मामला दर्ज किया गया था। इसके अलावा महाराष्ट्र राज्य में कोरोना महामारी के दौरान हुए लॉकडाउन में उत्पीड़न, बाल शोषण और बाल अधिकारों के उल्लंघन के कई मामले दर्ज किए गए थें।

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चौकाने वाली बात ये है कि इन तमाम मामलो के दर्ज होने के बाद भी महाराष्ट्र स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (MSCPCR) (Maharashtra State Commission for Protection of Child Rights) ने 2020 में एक भी शिकायत नहीं सुनी। HT द्वारा दायर एक RTI आवेदन के जवाब में राज्य के बाल अधिकार आयोग ने कहा है कि 2020 में MSCPCR के पास कुल 134 मामले दर्ज किए गए थे. लेकिन उस साल इन मामलों पर एक भी सुनवाई नहीं की गई जिससे इन मामलों का 100 प्रतिशत पेंडेसी दर बढ़ गया।

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MSCPCR एक अर्ध-न्यायिक निकाय है जो बाल शोषण, बच्चों के उत्पीड़न के मामलों और अपने अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की सुनवाई करता है। साल 2018 और 2020 के बीच इस आयोग के पास कुल 416 मामले आए, जिनमें से 164 मामले (लगभग 40 प्रतिशत) निपटाए गए। RTI की प्रतिक्रिया से यह भी पता चला कि आयोग में 12 स्थायी पदों में छह पद जनवरी 2021 तक खाली पड़े थे।

अभिभावक और शिक्षक करते हैं शिकायत
वहीं पिछले कुछ सालो में कई अभिभावक और शिक्षक आयोग के कमज़ोर रवैये के बारे में शिकायत करते रहे हैं। आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं जो शिकायतों की सुनवाई के दौरान वहां मौजूद होते हैं। प्रहर सुनवाई के लिए कम से कम दो सदस्यों के कोरम की आवश्यकता होती है, MSCPCR समिति का कार्यकाल तीन सालों का होता है। वहीं RTI से पता चला कि जून 2020 में, पिछली समिति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद, राज्य सरकार ने नए सदस्यों की नियुक्ति नहीं की, जिसके कारण शिकायतों का ढेर लग गया।

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इंडियावाइड पेरेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष अनुभा सहाय ने कहा कि आयोग को भेजी गई शिकायतें सरकार की उदासीनता के कारण अनसुनी रह गईं। पूरे लॉकडाउन के दौरान, कई स्कूलों ने ऑनलाइन कक्षाओं से हटाकर और अन्य चीजों के बीच अपनी परीक्षा आयोजित नहीं करने पर छात्रों को फीस का भुगतान नहीं करने के लिए परेशान किया। आयोग की वर्तमान स्थिति के कारण इनमें से किसी भी शिकायत को सुनवाई नहीं मिली।

मामले में लिया जाएगा संज्ञान
सहाय ने हाल ही में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) (National Commission for Protection of Child Rights) को पत्र लिखकर इस मामले पर संज्ञान लेने का आग्रह किया है। वहीं एनसीपीसीआर ने हाल ही में भंडारा घटना का संज्ञान लिया जिसमें सरकारी अस्पताल में आग लगने से नवजात बच्चों की मौत हुई थी और जिला कलेक्टर को घटना के दो दिनों के भीतर एक रिपोर्ट भेजने को कहा है।

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वहीं MSCPCR के सचिव, उदय जाधव ने कहा, हमने राज्य से जल्द से जल्द समिति बनाने का अनुरोध किया है और यह काम जल्द ही किया जाएगा। आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण घुगे, जिनका कार्यकाल जून 2020 में समाप्त हो गया था, ने कहा कि आयोग की भूमिका विशेष रूप से अब प्रासंगिक है, ऐसे कई मामले हैं जिसपर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के शुरुआती महीनों में हमने तीन तरह के बच्चों पर काम किया – जो अनाथालयों में रह रहे हैं, भागे हुए बच्चे हैं और जो अपने जैविक माता-पिता की देखभाल नहीं करते हैं।

हमने उन बच्चों के लिए वर्कशॉप और संवेदीकरण कार्यक्रम (Sensitisation Programmes ) किए, जिसमें उल्लंघन के बहुत सारे मामले भी पाए गए और इन मामलों में कार्रवाई की गई। हालांकि, जून में समिति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से सरकार ने नई समिति की नियुक्ति नहीं की है। इसलिए भंडारा की घटना और राज्य में ऐसी अन्य घटनाओं पर ध्यान नहीं दिया गया।

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इसी आयोग के खिलाफ 2016 में भी एक RTI आवेदन दायर किया गया था। जिससे पता चला कि साल 2015 से 2018 तक आयोग ने प्राप्त 280 मामलों में से केवल 33 का निपटारा किया था। MSCPCR आयोग की वेबसाइट के अनुसार साल 2017-18 में 90 आदेशों की तुलना में साल 2017-18 में केवल पांच आदेश पारित किए गए।

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